॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 11.6.7
देवा ऊचुः
नताः स्म ते नाथ पदारविन्दं
बुद्धीन्द्रियप्राणमनोवचोभिः ।
यच्चिन्त्यतेऽन्तर्हृदि भावयुक्तै-
र्मुमुक्षुभिः कर्ममयोरुपाशात्॥ ७
natāḥ sma te nātha padāravindaṃ
buddhīndriyaprāṇamanovacobhiḥ |
yaccintyate'ntarhṛdi bhāvayuktai-
rmumukṣubhiḥ karmamayorupāśāt|| 7
अर्थ
देवताओंने प्रार्थना की—स्वामी! कर्मोंके विकट फंदोंसे छूटनेकी इच्छावाले मुमुक्षुजन भक्ति-भावसे अपने हृदयमें जिसका चिन्तन करते रहते हैं, आपके उसी चरणकमलको हमलोगोंने अपनी बुद्धि, इन्द्रिय, प्राण, मन और वाणीसे साक्षात् नमस्कार किया है। अहो! आश्चर्य है!*॥ ७॥
टिप्पणियाँ
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यहाँ साष्टांग प्रणामसे तात्पर्य है—
दोर्भ्यां पादाभ्यां जानुभ्यामुरसा शिरसा दृशा। मनसा वचसा चेति प्रणामोऽष्टांग ईरितः॥
हाथोंसे, चरणोंसे, घुटनोंसे, वक्षःस्थलसे, सिरसे, नेत्रोंसे, मनसे और वाणीसे—इन आठ अंगोंसे किया गया प्रणाम साष्टांग प्रणाम कहलाता है।