श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.6.9

एकादश स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

शुद्धिर्नृणां न तु तथेड्य दुराशयानां

विद्याश्रुताध्ययनदानतपःक्रियाभिः।

सत्त्वात्मनामृषभ ते यशसि प्रवृद्ध-

सच्छ्रद्धया श्रवणसम्भृतया यथा स्यात्॥ ९

śuddhirnṛṇāṃ na tu tatheḍya durāśayānāṃ

vidyāśrutādhyayanadānatapaḥkriyābhiḥ|

sattvātmanāmṛṣabha te yaśasi pravṛddha-

sacchraddhayā śravaṇasambhṛtayā yathā syāt|| 9

अर्थ

स्तुति करनेयोग्य परमात्मन्! जिन मनुष्योंकी चित्तवृत्ति राग-द्वेषादिसे कलुषित हैं, वे उपासना, वेदाध्ययन, दान, तपस्या और यज्ञ आदि कर्म भले ही करें; परंतु उनकी वैसी शुद्धि नहीं हो सकती, जैसी श्रवणके द्वारा सम्पुष्ट शुद्धान्तःकरण सज्जन पुरुषोंकी आपकी लीलाकथा, कीर्तिके विषयमें दिनोंदिन बढ़कर परिपूर्ण होनेवाली श्रद्धासे होती है॥ ९॥

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