श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.7.15

एकादश स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

त्यागोऽयं दुष्करो भूमन् कामानां विषयात्मभिः।

सुतरां त्वयि सर्वात्मन्‍नभक्तैरिति मे मतिः॥ १५

tyāgo'yaṃ duṣkaro bhūman kāmānāṃ viṣayātmabhiḥ|

sutarāṃ tvayi sarvātmannabhaktairiti me matiḥ|| 15

अर्थ

परन्तु अनन्त! जो लोग विषयोंके चिन्तन और सेवनमें घुल-मिल गये हैं, विषयात्मा हो गये हैं, उनके लिये विषय-भोगों और कामनाओंका त्याग अत्यन्त कठिन है। सर्वस्वरूप! उनमें भी जो लोग आपसे विमुख हैं, उनके लिये तो इस प्रकारका त्याग सर्वथा असम्भव ही है ऐसा मेरा निश्‍चय है॥ १५॥

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