एक बार धर्मके मर्मज्ञ राजा यदुने देखा कि एक त्रिकालदर्शी तरुण अवधूत ब्राह्मण निर्भय विचर रहे हैं। तब उन्होंने उनसे यह प्रश्न किया॥ २५॥
अवधूतं द्विजं कंचिच्चरन्तमकुतोभयम्।
कविं निरीक्ष्य तरुणं यदुः पप्रच्छ धर्मवित्॥ २५
एक बार धर्मके मर्मज्ञ राजा यदुने देखा कि एक त्रिकालदर्शी तरुण अवधूत ब्राह्मण निर्भय विचर रहे हैं। तब उन्होंने उनसे यह प्रश्न किया॥ २५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.7.25 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 755) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/7/25/