श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.7.25

एकादश स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

अवधूतं द्विजं कंचिच्चरन्तमकुतोभयम्।

कविं निरीक्ष्य तरुणं यदुः पप्रच्छ धर्मवित्॥ २५

avadhūtaṃ dvijaṃ kaṃciccarantamakutobhayam|

kaviṃ nirīkṣya taruṇaṃ yaduḥ papraccha dharmavit|| 25

अर्थ

एक बार धर्मके मर्मज्ञ राजा यदुने देखा कि एक त्रिकालदर्शी तरुण अवधूत ब्राह्मण निर्भय विचर रहे हैं। तब उन्होंने उनसे यह प्रश्‍न किया॥ २५॥

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