श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.7.33

एकादश स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

पृथिवी वायुराकाशमापोऽग्‍निश्‍चन्द्रमा रविः।

कपोतोऽजगरः सिन्धुः पतंगो मधुकृद् गजः॥ ३३

pṛthivī vāyurākāśamāpo'gniścandramā raviḥ|

kapoto'jagaraḥ sindhuḥ pataṃgo madhukṛd gajaḥ|| 33

अर्थ

मेरे गुरुओंके नाम हैं—पृथ्वी, वायु, आकाश, जल, अग्‍नि, चन्द्रमा, सूर्य, कबूतर, अजगर, समुद्र, पतंग, भौंरा या मधुमक्खी, हाथी, शहद निकालनेवाला, हरिन, मछली, पिंगला वेश्या, कुरर पक्षी, बालक, कुँआरी कन्या, बाण बनानेवाला, सर्प, मकड़ी और भृंगी कीट॥ ३३-३४॥

यह अर्थ श्लोक 33–34 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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