श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.7.38

एकादश स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

शश्‍वत्परार्थसर्वेहः परार्थैकान्तसम्भवः।

साधुः शिक्षेत भूभृत्तो नगशिष्यः परात्मताम्॥ ३८

śaśvatparārthasarvehaḥ parārthaikāntasambhavaḥ|

sādhuḥ śikṣeta bhūbhṛtto nagaśiṣyaḥ parātmatām|| 38

अर्थ

पृथ्वीके ही विकार पर्वत और वृक्षसे मैंने यह शिक्षा ग्रहण की है कि जैसे उनकी सारी चेष्टाएँ सदा-सर्वदा दूसरोंके हितके लिये ही होती हैं, बल्कि यों कहना चाहिये कि उनका जन्म ही एकमात्र दूसरोंका हित करनेके लिये ही हुआ है, साधु पुरुषको चाहिये कि उनकी शिष्यता स्वीकार करके उनसे परोपकारकी शिक्षा ग्रहण करे॥ ३८॥

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