श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.7.50

एकादश स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

गुणैर्गुणानुपादत्ते यथाकालं विमुञ्चति।

न तेषु युज्यते योगी गोभिर्गा इव गोपतिः॥ ५०

guṇairguṇānupādatte yathākālaṃ vimuñcati|

na teṣu yujyate yogī gobhirgā iva gopatiḥ|| 50

अर्थ

राजन्! मैंने सूर्यसे यह शिक्षा ग्रहण की है कि जैसे वे अपनी किरणोंसे पृथ्वीका जल खींचते और समयपर उसे बरसा देते हैं, वैसे ही योगी पुरुष इन्द्रियोंके द्वारा समयपर विषयोंका ग्रहण करता है और समय आनेपर उनका त्याग—उनका दान भी कर देता है। किसी भी समय उसे इन्द्रियके किसी भी विषयमें आसक्ति नहीं होती॥ ५०॥

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