राजन्! सच पूछो तो वे कबूतर-कबूतरी भगवान्की मायासे मोहित हो रहे थे। उनका हृदय एक-दूसरेके स्नेहबन्धनसे बँध रहा था। वे अपने नन्हें-नन्हें बच्चोंके पालन-पोषणमें इतने व्यग्र रहते कि उन्हें दीन-दुनिया, लोक-परलोककी याद ही न आती॥ ६१॥
स्नेहानुबद्धहृदयावन्योन्यं विष्णुमायया।
विमोहितौ दीनधियौ शिशून् पुपुषतुः प्रजाः॥ ६१
राजन्! सच पूछो तो वे कबूतर-कबूतरी भगवान्की मायासे मोहित हो रहे थे। उनका हृदय एक-दूसरेके स्नेहबन्धनसे बँध रहा था। वे अपने नन्हें-नन्हें बच्चोंके पालन-पोषणमें इतने व्यग्र रहते कि उन्हें दीन-दुनिया, लोक-परलोककी याद ही न आती॥ ६१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.7.61 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 761) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/7/61/