श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.7.70

एकादश स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

सोऽहं शून्ये गृहे दीनो मृतदारो मृतप्रजः।

जिजीविषे किमर्थं वा विधुरो दुःखजीवितः॥ ७०

so'haṃ śūnye gṛhe dīno mṛtadāro mṛtaprajaḥ|

jijīviṣe kimarthaṃ vā vidhuro duḥkhajīvitaḥ|| 70

अर्थ

मेरे बच्चे मर गये। मेरी पत्‍नी जाती रही। मेरा अब संसारमें क्या काम है? मुझ दीनका यह विधुर जीवन—बिना गृहिणीका जीवन जलनका—व्यथाका जीवन है। अब मैं इस सूने घरमें किसके लिये जीऊँ?॥ ७०॥

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