श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.7.74

एकादश स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

यः प्राप्य मानुषं लोकं मुक्तिद्वारमपावृतम्।

गृहेषु खगवत् सक्तस्तमारूढच्युतं विदुः॥ ७४

yaḥ prāpya mānuṣaṃ lokaṃ muktidvāramapāvṛtam|

gṛheṣu khagavat saktastamārūḍhacyutaṃ viduḥ|| 74

अर्थ

यह मनुष्य-शरीर मुक्तिका खुला हुआ द्वार है। इसे पाकर भी जो कबूतरकी तरह अपनी घर-गृहस्थीमें ही फँसा हुआ है, वह बहुत ऊँचेतक चढ़कर गिर रहा है। शास्त्रकी भाषामें वह ‘आरूढ़च्युत’ है॥ ७४॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायामेकादशस्कन्धे
सप्तमोऽध्यायः॥ ७॥

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