श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.8.10

एकादश स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

अणुभ्यश्‍च महद‍्भ्यश्‍च शास्त्रेभ्यः कुशलो नरः।

सर्वतः सारमादद्यात् पुष्पेभ्य इव षट्पदः॥ १०

aṇubhyaśca mahadbhyaśca śāstrebhyaḥ kuśalo naraḥ|

sarvataḥ sāramādadyāt puṣpebhya iva ṣaṭpadaḥ|| 10

अर्थ

जिस प्रकार भौंरा विभिन्‍न पुष्पोंसे—चाहे वे छोटे हों या बड़े—उनका सार संग्रह करता है, वैसे ही बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि छोटे-बड़े सभी शास्त्रोंसे उनका सार—उनका रस निचोड़ ले॥ १०॥

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