श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.8.16

एकादश स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

सुदुःखोपार्जितैर्वित्तैराशासानां गृहाशिषः।

मधुहेवाग्रतो भुङ्क्ते यतिर्वै गृहमेधिनाम्॥ १६

suduḥkhopārjitairvittairāśāsānāṃ gṛhāśiṣaḥ|

madhuhevāgrato bhuṅkte yatirvai gṛhamedhinām|| 16

अर्थ

तुम देखते हो न कि मधुहारी मधुमक्खियोंका जोड़ा हुआ मधु उनके खानेसे पहले ही साफ कर जाता है; वैसे ही गृहस्थोंके बहुत कठिनाईसे संचित किये पदार्थोंको, जिनसे वे सुखभोगकी अभिलाषा रखते हैं, उनसे भी पहले संन्यासी और ब्रह्मचारी भोगते हैं। क्योंकि गृहस्थ तो पहले अतिथि-अभ्यागतोंको भोजन कराकर ही स्वयं भोजन करेगा॥ १६॥

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