जब आने-जानेवाले आगे बढ़ जाते, तब फिर वह संकेतजीविनी वेश्या यही सोचती कि अवश्य ही अबकी बार कोई ऐसा धनी मेरे पास आवेगा जो मुझे बहुत-सा धन देगा॥ २५॥
आगतेष्वपयातेषु सा संकेतोपजीविनी।
अप्यन्यो वित्तवान् कोऽपि मामुपैष्यति भूरिदः॥ २५
जब आने-जानेवाले आगे बढ़ जाते, तब फिर वह संकेतजीविनी वेश्या यही सोचती कि अवश्य ही अबकी बार कोई ऐसा धनी मेरे पास आवेगा जो मुझे बहुत-सा धन देगा॥ २५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.8.25 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 766) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/8/25/