श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.8.34

एकादश स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

विदेहानां पुरे ह्यस्मिन्‍नहमेकैव मूढधीः।

यान्यमिच्छन्त्यसत्यस्मादात्मदात् काममच्युतात्॥ ३४

videhānāṃ pure hyasminnahamekaiva mūḍhadhīḥ|

yānyamicchantyasatyasmādātmadāt kāmamacyutāt|| 34

अर्थ

यों तो यह विदेहोंकी—जीवन्मुक्तोंकी नगरी है, परन्तु इसमें मैं ही सबसे मूर्ख और दुष्ट हूँ; क्योंकि अकेली मैं ही तो आत्मदानी, अविनाशी एवं परमप्रियतम परमात्माको छोड़कर दूसरे पुरुषकी अभिलाषा करती हूँ॥ ३४॥✎ 1740

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1740 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: शान्ति-लाभ → शान्तिलाभ

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