श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.8.37

एकादश स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

नूनं मे भगवान् प्रीतो विष्णुः केनापि कर्मणा।

निर्वेदोऽयं दुराशाया यन्मे जातः सुखावहः॥ ३७

nūnaṃ me bhagavān prīto viṣṇuḥ kenāpi karmaṇā|

nirvedo'yaṃ durāśāyā yanme jātaḥ sukhāvahaḥ|| 37

अर्थ

अवश्य ही मेरे किसी शुभकर्मसे विष्णुभगवान् मुझपर प्रसन्‍न हैं, तभी तो दुराशासे मुझे इस प्रकार वैराग्य हुआ है। अवश्य ही मेरा यह वैराग्य सुख देनेवाला होगा॥ ३७॥✎ 1740

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1740 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: शान्ति-लाभ → शान्तिलाभ

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें