श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.9.13

एकादश स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

तदैवमात्मन्यवरुद्धचित्तो

न वेद किंचिद् बहिरन्तरं वा।

यथेषुकारो नृपतिं व्रजन्त-

मिषौ गतात्मा न ददर्श पार्श्‍वे॥ १३

tadaivamātmanyavaruddhacitto

na veda kiṃcid bahirantaraṃ vā|

yatheṣukāro nṛpatiṃ vrajanta-

miṣau gatātmā na dadarśa pārśve|| 13

अर्थ

इस प्रकार जिसका चित्त अपने आत्मामें ही स्थिर—निरुद्ध हो जाता है, उसे बाहर-भीतर कहीं किसी पदार्थका भान नहीं होता। मैंने देखा था कि एक बाण बनानेवाला कारीगर बाण बनानेमें इतना तन्मय हो रहा था कि उसके पाससे ही दलबलके साथ राजाकी सवारी निकल गयी और उसे पतातक न चला॥ १३॥

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