श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.9.30

एकादश स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

एवं संजातवैराग्यो विज्ञानालोक आत्मनि।

विचरामि महीमेतां मुक्तसंगोऽनहंकृतिः॥ ३०

evaṃ saṃjātavairāgyo vijñānāloka ātmani|

vicarāmi mahīmetāṃ muktasaṃgo'nahaṃkṛtiḥ|| 30

अर्थ

राजन्! यही सब सोच-विचारकर मुझे जगत‍्से वैराग्य हो गया। मेरे हृदयमें ज्ञान-विज्ञानकी ज्योति जगमगाती रहती है। न तो कहीं मेरी आसक्ति है और न कहीं अहंकार ही। अब मैं स्वच्छन्दरूपसे इस पृथ्वीमें विचरण करता हूँ॥ ३०॥ राजन्! अकेले गुरुसे ही यथेष्ट और सुदृढ़ बोध नहीं होता, उसके लिये अपनी बुद्धिसे भी बहुत कुछ सोचने-समझनेकी आवश्यकता है। देखो! ऋषियोंने एक ही अद्वितीय ब्रह्मका अनेकों प्रकारसे गान किया है। (यदि तुम स्वयं विचारकर निर्णय न करोगे तो ब्रह्मके वास्तविक स्वरूपको कैसे जान सकोगे?)॥ ३१॥

यह व्याख्या श्लोक 11.9.30 से 11.9.31 तककी एक साथ है।

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