श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.9.8

एकादश स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

उभयोरप्यभूद् घोषो ह्यवघ्नन्त्याः स्म शंखयोः।

तत्राप्येकं निरभिददेकस्मान्‍नाभवद् ध्वनिः॥ ८

ubhayorapyabhūd ghoṣo hyavaghnantyāḥ sma śaṃkhayoḥ|

tatrāpyekaṃ nirabhidadekasmānnābhavad dhvaniḥ|| 8

अर्थ

अब वह फिर धान कूटने लगी। परन्तु वे दो-दो चूड़ियाँ भी बजने लगीं, तब उसने एक-एक चूड़ी और तोड़ दी। जब दोनों कलाइयोंमें केवल एक-एक चूड़ी रह गयी तब किसी प्रकारकी आवाज नहीं हुई॥ ८॥

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