भृगुवंशशिरोमणि मार्कण्डेय मुनिको उनके महायोगका परम फल प्राप्त हो गया। वे भगवान्के अनन्यप्रेमी हो गये। अब भी वे भक्तिभावभरित हृदयसे पृथ्वीपर विचरण किया करते हैं॥ ३९॥✎ 1785
सोऽप्यवाप्तमहायोगमहिमा भार्गवोत्तमः।
विचरत्यधुनाप्यद्धा हरावेकान्ततां गतः॥ ३९
भृगुवंशशिरोमणि मार्कण्डेय मुनिको उनके महायोगका परम फल प्राप्त हो गया। वे भगवान्के अनन्यप्रेमी हो गये। अब भी वे भक्तिभावभरित हृदयसे पृथ्वीपर विचरण किया करते हैं॥ ३९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 12.10.39 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 963) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/10/39/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)