श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 12.10.40

द्वादश स्कन्ध · अध्याय 10 · अथ दशमोऽध्यायः

अनुवर्णितमेतत्ते मार्कण्डेयस्य धीमतः।

अनुभूतं भगवतो मायावैभवमद्भुतम्॥ ४०

anuvarṇitametatte mārkaṇḍeyasya dhīmataḥ|

anubhūtaṃ bhagavato māyāvaibhavamadbhutam|| 40

अर्थ

परम ज्ञानसम्पन्‍न मार्कण्डेय मुनिने भगवान्‌की योगमायासे जिस अद्भुत लीलाका अनुभव किया था, वह मैंने आपलोगोंको सुना दिया॥ ४०॥✎ 1785

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1785 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: अनादि-कालसे → अनादिकालसे

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