श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 12.11.50

द्वादश स्कन्ध · अध्याय 11 · अथैकादशोऽध्यायः

एवं ह्यनादिनिधनो भगवान् हरिरीश्‍वरः।

कल्पे कल्पे स्वमात्मानं व्यूह्य लोकानवत्यजः॥ ५०

evaṃ hyanādinidhano bhagavān harirīśvaraḥ|

kalpe kalpe svamātmānaṃ vyūhya lokānavatyajaḥ|| 50

अर्थ

इस प्रकार अनादि, अनन्त, अजन्मा भगवान् श्रीहरि ही कल्प-कल्पमें अपने स्वरूपका विभाग करके लोकोंका पालन-पोषण करते-रहते हैं॥ ५०॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां द्वादशस्कन्धे
आदित्यव्यूहविवरणं नामैकादशोऽध्यायः॥ ११॥

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