श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 12.3.36

द्वादश स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

पतिं त्यक्ष्यन्ति निर्द्रव्यं भृत्या अप्यखिलोत्तमम्।

भृत्यं विपन्‍नं पतयः कौलं गाश्‍चापयस्विनीः॥ ३६

patiṃ tyakṣyanti nirdravyaṃ bhṛtyā apyakhilottamam|

bhṛtyaṃ vipannaṃ patayaḥ kaulaṃ gāścāpayasvinīḥ|| 36

अर्थ

स्वामी चाहे सर्वश्रेष्ठ ही क्यों न हों—जब सेवक लोग देखते हैं कि इसके पास धन-दौलत नहीं रही, तब उसे छोड़कर भाग जाते हैं। सेवक चाहे कितना ही पुराना क्यों न हो—परन्तु जब वह किसी विपत्तिमें पड़ जाता है, तब स्वामी उसे छोड़ देते हैं,। और तो क्या, जब गौएँ बकेन हो जाती हैं—दूध देना बन्द कर देती हैं, तब लोग उनका भी परित्याग कर देते हैं॥ ३६॥

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