श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 12.3.35

द्वादश स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

पणयिष्यन्ति वै क्षुद्राः किराटाः कूटकारिणः।

अनापद्यपि मंस्यन्ते वार्तां साधुजुगुप्सिताम्॥ ३५

paṇayiṣyanti vai kṣudrāḥ kirāṭāḥ kūṭakāriṇaḥ|

anāpadyapi maṃsyante vārtāṃ sādhujugupsitām|| 35

अर्थ

व्यापारियोंके हृदय अत्यन्त क्षुद्र हो जाते हैं। वे कौड़ी—कौड़ीसे लिपटे रहते और छदाम-छदामके लिये धोखाधड़ी करने लगते हैं। और तो क्या—आपत्तिकाल न होनेपर तथा धनी होनेपर भी वे निम्‍नश्रेणीके व्यापारोंको, जिनकी सत्पुरुष निन्दा करते हैं, ठीक समझने और अपनाने लगते हैं॥ ३५॥✎ 1454

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1454 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): हैें॥ → हैं॥

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