जो लोग मृत्युके निकट पहुँच रहे हैं, उन्हें सब प्रकारसे परम ऐश्वर्यशाली भगवान्का ही ध्यान करना चाहिये। प्यारे परीक्षित्! सबके परम आश्रय और सर्वात्मा भगवान् अपना ध्यान करनेवालेको अपने स्वरूपमें लीन कर लेते हैं, उसे अपना स्वरूप बना लेते हैं॥ ५०॥✎ 1781
म्रियमाणैरभिध्येयो भगवान् परमेश्वरः।
आत्मभावं नयत्यंग सर्वात्मा सर्वसंश्रयः॥ ५०
जो लोग मृत्युके निकट पहुँच रहे हैं, उन्हें सब प्रकारसे परम ऐश्वर्यशाली भगवान्का ही ध्यान करना चाहिये। प्यारे परीक्षित्! सबके परम आश्रय और सर्वात्मा भगवान् अपना ध्यान करनेवालेको अपने स्वरूपमें लीन कर लेते हैं, उसे अपना स्वरूप बना लेते हैं॥ ५०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 12.3.50 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 923) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/3/50/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)