श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 12.3.51

द्वादश स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

कलेर्दोषनिधे राजन्‍नस्ति ह्येको महान् गुणः।

कीर्तनादेव कृष्णस्य मुक्तसंगः परं व्रजेत्॥ ५१

kalerdoṣanidhe rājannasti hyeko mahān guṇaḥ|

kīrtanādeva kṛṣṇasya muktasaṃgaḥ paraṃ vrajet|| 51

अर्थ

परीक्षित्! यों तो कलियुग दोषोंका खजाना है, परन्तु इसमें एक बहुत बड़ा गुण है। वह गुण यही है कि कलियुगमें केवल भगवान् श्रीकृष्णका संकीर्तन करनेमात्रसे ही सारी आसक्तियाँ छूट जाती हैं और परमात्माकी प्राप्ति हो जाती है॥ ५१॥✎ 1782

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1782 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: विधि-पूर्वक → विधिपूर्वक

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