श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 12.3.52

द्वादश स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

कृते यद् ध्यायतो विष्णुं त्रेतायां यजतो मखैः।

द्वापरे परिचर्यायां कलौ तद्धरिकीर्तनात्॥ ५२

kṛte yad dhyāyato viṣṇuṃ tretāyāṃ yajato makhaiḥ|

dvāpare paricaryāyāṃ kalau taddharikīrtanāt|| 52

अर्थ

सत्ययुगमें भगवान्‌का ध्यान करनेसे, त्रेतामें बड़े-बड़े यज्ञोंके द्वारा उनकी आराधना करनेसे और द्वापरमें विधिपूर्वक उनकी पूजा-सेवासे जो फल मिलता है, वह कलियुगमें केवल भगवन्‍नामका कीर्तन करनेसे ही प्राप्त हो जाता है॥ ५२॥✎ 1782

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां द्वादशस्कन्धे तृतीयोऽध्यायः॥ ३॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1782 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: विधि-पूर्वक → विधिपूर्वक

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