श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! (तीसरे स्कन्धमें) परमाणुसे लेकर द्विपरार्धपर्यन्त कालका स्वरूप और एक-एक युग कितने-कितने वर्षोंका होता है, यह मैं तुम्हें बतला चुका हूँ। अब तुम कल्पकी स्थिति और उसके प्रलयका वर्णन भी सुनो॥ १॥
कालस्ते परमाण्वादिर्द्विपरार्धावधिर्नृप।
कथितो युगमानं च शृणु कल्पलयावपि॥ १
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! (तीसरे स्कन्धमें) परमाणुसे लेकर द्विपरार्धपर्यन्त कालका स्वरूप और एक-एक युग कितने-कितने वर्षोंका होता है, यह मैं तुम्हें बतला चुका हूँ। अब तुम कल्पकी स्थिति और उसके प्रलयका वर्णन भी सुनो॥ १॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 12.4.1 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 924) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/4/1/