श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 12.3.7

द्वादश स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

मत्कृते पितृपुत्राणां भ्रातॄणां चापि विग्रहः।✎ 1240

जायते ह्यसतां राज्ये ममताबद्धचेतसाम्॥ ७

matkṛte pitṛputrāṇāṃ bhrātṝṇāṃ cāpi vigrahaḥ|

jāyate hyasatāṃ rājye mamatābaddhacetasām|| 7

अर्थ

जिनके चित्तमें यह बात दृढ़ मूल हो गयी है कि यह पृथ्वी मेरी है, उन दुष्टोंके राज्यमें मेरे लिये पिता-पुत्र और भाई-भाई भी आपसमें लड़ बैठते हैं॥ ७॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1240 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): भ्रातृणां → भ्रातॄणां

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें