तत्पश्चात् महत्तत्त्व अहंकारको और सत्त्व आदि गुण महत्तत्त्वको ग्रस लेते हैं। परीक्षित्! यह सब कालकी महिमा है। उसीकी प्रेरणासे अव्यक्त प्रकृति गुणोंको ग्रस लेती है और तब केवल प्रकृति-ही-प्रकृति शेष रह जाती है॥ १८॥
महान् ग्रसत्यहंकारं गुणाः सत्त्वादयश्च तम्।
ग्रसतेऽव्याकृतं राजन् गुणान् कालेन चोदितम्॥ १८
तत्पश्चात् महत्तत्त्व अहंकारको और सत्त्व आदि गुण महत्तत्त्वको ग्रस लेते हैं। परीक्षित्! यह सब कालकी महिमा है। उसीकी प्रेरणासे अव्यक्त प्रकृति गुणोंको ग्रस लेती है और तब केवल प्रकृति-ही-प्रकृति शेष रह जाती है॥ १८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 12.4.18 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 926) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/4/18/