॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 12.4.20
न यत्र वाचो न मनो न सत्त्वं
तमो रजो वा महदादयोऽमी।
न प्राणबुद्धीन्द्रियदेवता वा
न सन्निवेशः खलु लोककल्पः॥ २०
na yatra vāco na mano na sattvaṃ
tamo rajo vā mahadādayo'mī|
na prāṇabuddhīndriyadevatā vā
na sanniveśaḥ khalu lokakalpaḥ|| 20
अर्थ
उस समय प्रकृतिमें स्थूल अथवा सूक्ष्मरूपसे वाणी, मन, सत्त्वगुण, रजोगुण, तमोगुण, महत्तत्त्व आदि विकार, प्राण, बुद्धि, इन्द्रिय और उनके देवता आदि कुछ नहीं रहते। सृष्टिके समय रहनेवाले लोकोंकी कल्पना और उनकी स्थिति भी नहीं रहती॥ २०॥