श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 12.6.17

द्वादश स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

सर्पसत्रे समिद्धा‌ग्‍नौ दह्यमानान् महोरगान्।

दृष्ट्वेन्द्रं भयसंवि‌ग्‍नस्तक्षकः शरणं ययौ॥ १७

sarpasatre samiddhāgnau dahyamānān mahoragān|

dṛṣṭvendraṃ bhayasaṃvignastakṣakaḥ śaraṇaṃ yayau|| 17

अर्थ

तक्षकने देखा कि जनमेजयके सर्प-सत्रकी प्रज्वलित अग्‍निमें बड़े-बड़े महासर्प भस्म होते जा रहे हैं, तब वह अत्यन्त भयभीत होकर देवराज इन्द्रकी शरणमें गया॥ १७॥

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