॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 12.6.26
सर्पचौराग्निविद्युद्भ्यः क्षुत्तृड्व्याध्यादिभिर्नृप।
पंचत्वमृच्छते जन्तुर्भुङ्क्त आरब्धकर्म तत्॥ २६
sarpacaurāgnividyudbhyaḥ kṣuttṛḍvyādhyādibhirnṛpa|
paṃcatvamṛcchate janturbhuṅkta ārabdhakarma tat|| 26
अर्थ
जनमेजय! यों तो बहुत-से लोगोंकी मृत्यु साँप, चोर, आग, बिजली आदिसे तथा भूख-प्यास, रोग आदि निमित्तोंसे होती है; परन्तु यह तो कहनेकी बात है। वास्तवमें तो सभी प्राणी अपने प्रारब्ध-कर्मका ही उपभोग करते हैं॥ २६॥