sarpā anāgaso dagdhā janairdiṣṭaṃ hi bhujyate|| 27
अर्थ
राजन्! तुमने बहुत-से निरपराध सर्पोंको जला दिया है। इस अभिचार-यज्ञका फल केवल प्राणियोंकी हिंसा ही है। इसलिये इसे बन्द कर देना चाहिये। क्योंकि जगत्के सभी प्राणी अपने-अपने प्रारब्धकर्मका ही भोग कर रहे हैं॥ २७॥
तस्मात् सत्रमिदं राजन् संस्थीयेताभिचारिकम्।
सर्पा अनागसो दग्धा जनैर्दिष्टं हि भुज्यते॥ २७
राजन्! तुमने बहुत-से निरपराध सर्पोंको जला दिया है। इस अभिचार-यज्ञका फल केवल प्राणियोंकी हिंसा ही है। इसलिये इसे बन्द कर देना चाहिये। क्योंकि जगत्के सभी प्राणी अपने-अपने प्रारब्धकर्मका ही भोग कर रहे हैं॥ २७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 12.6.27 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 935) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/6/27/