॥ श्रीहरिः ॥
हिरण्यनाभः कौसल्यः पौष्यंजिश्च सुकर्मणः।
शिष्यौ जगृहतुश्चान्य आवन्त्यो ब्रह्मवित्तमः॥ ७७
hiraṇyanābhaḥ kausalyaḥ pauṣyaṃjiśca sukarmaṇaḥ|
śiṣyau jagṛhatuścānya āvantyo brahmavittamaḥ|| 77
अर्थ
सुकर्माके शिष्य कोसलदेशनिवासी हिरण्यनाभ, पौष्यंजि और ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ आवन्त्यने उन शाखाओंको ग्रहण किया॥ ७७॥
हिरण्यनाभः कौसल्यः पौष्यंजिश्च सुकर्मणः।
शिष्यौ जगृहतुश्चान्य आवन्त्यो ब्रह्मवित्तमः॥ ७७
सुकर्माके शिष्य कोसलदेशनिवासी हिरण्यनाभ, पौष्यंजि और ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ आवन्त्यने उन शाखाओंको ग्रहण किया॥ ७७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 12.6.77 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 942) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/6/77/