॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 12.7.10
दशभिर्लक्षणैर्युक्तं पुराणं तद्विदो विदुः।
केचित् पंचविधं ब्रह्मन् महदल्पव्यवस्थया॥ १०
daśabhirlakṣaṇairyuktaṃ purāṇaṃ tadvido viduḥ|
kecit paṃcavidhaṃ brahman mahadalpavyavasthayā|| 10
अर्थ
शौनकजी! पुराणोंके पारदर्शी विद्वान् बतलाते हैं कि पुराणोंके दस लक्षण हैं—विश्वसर्ग, विसर्ग, वृत्ति, रक्षा, मन्वन्तर, वंश, वंशानुचरित, संस्था (प्रलय), हेतु (ऊति) और अपाश्रय। कोई-कोई आचार्य पुराणोंके पाँच ही लक्षण मानते हैं। दोनों ही बातें ठीक हैं, क्योंकि महापुराणोंमें दस लक्षण होते हैं और छोटे पुराणोंमें पाँच। विस्तार करके दस बतलाते हैं और संक्षेप करके पाँच॥ ९-१०॥