श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 12.7.17

द्वादश स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

नैमित्तिकः प्राकृतिको नित्य आत्यन्तिको लयः।

संस्थेति कविभिः प्रोक्ता चतुर्धास्य स्वभावतः॥ १७

naimittikaḥ prākṛtiko nitya ātyantiko layaḥ|

saṃstheti kavibhiḥ proktā caturdhāsya svabhāvataḥ|| 17

अर्थ

इस विश्‍वब्रह्माण्डका स्वभावसे ही प्रलय हो जाता है। उसके चार भेद हैं—नैमित्तिक, प्राकृतिक, नित्य और आत्यन्तिक। तत्त्वज्ञ विद्वानोंने इन्हींको ‘संस्था’ कहा है॥ १७॥

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