॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 12.7.18
हेतुर्जीवोऽस्य सर्गादेरविद्याकर्मकारकः।
यं चानुशयिनं प्राहुरव्याकृतमुतापरे॥ १८
heturjīvo'sya sargāderavidyākarmakārakaḥ|
yaṃ cānuśayinaṃ prāhuravyākṛtamutāpare|| 18
अर्थ
पुराणोंके लक्षणमें ‘हेतु’ नामसे जिसका व्यवहार होता है, वह जीव ही है; क्योंकि वास्तवमें वही सर्ग-विसर्ग आदिका हेतु है और अविद्यावश अनेकों प्रकारके कर्मकलापमें उलझ गया है। जो लोग उसे चैतन्यप्रधानकी दृष्टिसे देखते हैं, वे उसे अनुशयी अर्थात् प्रकृतिमें शयन करनेवाला कहते हैं; और जो उपाधिकी दृष्टिसे कहते हैं, वे उसे अव्याकृत अर्थात् प्रकृतिरूप कहते हैं॥ १८॥