उनके सामने ही पुंजिकस्थली नामकी सुन्दरी अप्सरा गेंद खेल रही थी। स्तनोंके भारसे बार-बार उसकी कमर लचक जाया करती थी। साथ ही उसकी चोटियोंमें गुँथे हुए सुन्दर-सुन्दर पुष्प और मालाएँ बिखरकर धरतीपर गिरती जा रही थीं॥ २६॥
क्रीडन्त्याः पुंजिकस्थल्याः कन्दुकैः स्तनगौरवात्।
भृशमुद्विग्नमध्यायाः केशविस्रंसितस्रजः॥ २६
उनके सामने ही पुंजिकस्थली नामकी सुन्दरी अप्सरा गेंद खेल रही थी। स्तनोंके भारसे बार-बार उसकी कमर लचक जाया करती थी। साथ ही उसकी चोटियोंमें गुँथे हुए सुन्दर-सुन्दर पुष्प और मालाएँ बिखरकर धरतीपर गिरती जा रही थीं॥ २६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 12.8.26 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 949) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/8/26/