श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 12.8.27

द्वादश स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

इतस्ततो भ्रमद‍्दृष्टेश्‍चलन्त्या अनुकन्दुकम्।

वायुर्जहार तद्वासः सूक्ष्मं त्रुटितमेखलम्॥ २७

itastato bhramaddṛṣṭeścalantyā anukandukam|

vāyurjahāra tadvāsaḥ sūkṣmaṃ truṭitamekhalam|| 27

अर्थ

कभी-कभी वह तिरछी चितवनसे इधर-उधर देख लिया करती थी। उसके नेत्र कभी गेंदके साथ आकाशकी ओर जाते, कभी धरतीकी ओर और कभी हथेलियोंकी ओर। वह बड़े हाव-भावके साथ गेंदकी ओर दौड़ती थी। उसी समय उसकी करधनी टूट गयी और वायुने उसकी झीनी-सी साड़ीको शरीरसे अलग कर दिया॥ २७॥

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