श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 12.8.41

द्वादश स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

मूर्ती इमे भगवतो भगवंस्त्रिलोक्याः

क्षेमाय तापविरमाय च मृत्युजित्यै।

नाना बिभर्ष्यवितुमन्यतनूर्यथेदं

सृष्ट्वा पुनर्ग्रससि सर्वमिवोर्णनाभिः॥ ४१

mūrtī ime bhagavato bhagavaṃstrilokyāḥ

kṣemāya tāpaviramāya ca mṛtyujityai|

nānā bibharṣyavitumanyatanūryathedaṃ

sṛṣṭvā punargrasasi sarvamivorṇanābhiḥ|| 41

अर्थ

प्रभो! आपने केवल विश्‍वकी रक्षाके लिये ही जैसे मत्स्य-कूर्म आदि अनेकों अवतार ग्रहण किये हैं, वैसे ही आपने ये दोनों रूप भी त्रिलोकीके कल्याण, उसकी दुःख-निवृत्ति और विश्‍वके प्राणियोंको मृत्युपर विजय प्राप्त करानेके लिये ग्रहण किया है। आप रक्षा तो करते ही हैं, मकड़ीके समान अपनेसे ही इस विश्‍वको प्रकट करते हैं और फिर स्वयं अपनेमें ही लीन भी कर लेते हैं॥ ४१॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें