श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 12.8.42

द्वादश स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

तस्यावितुः स्थिरचरेशितुरङ्‌घ्रिमूलं

यत्स्थं न कर्मगुणकालरुजः स्पृशन्ति।

यद् वै स्तुवन्ति निनमन्ति यजन्त्यभीक्ष्णं

ध्यायन्ति वेदहृदया मुनयस्तदाप्त्यै॥ ४२

tasyāvituḥ sthiracareśituraṅghrimūlaṃ

yatsthaṃ na karmaguṇakālarujaḥ spṛśanti|

yad vai stuvanti ninamanti yajantyabhīkṣṇaṃ

dhyāyanti vedahṛdayā munayastadāptyai|| 42

अर्थ

आप चराचरका पालन और नियमन करनेवाले हैं। मैं आपके चरणकमलोंमें प्रणाम करता हूँ। जो आपके चरणकमलोंकी शरण ग्रहण कर लेते हैं, उन्हें कर्म, गुण और कालजनित क्लेश स्पर्श भी नहीं कर सकते। वेदके मर्मज्ञ ऋषि-मुनि आपकी प्राप्तिके लिये निरन्तर आपका स्तवन, वन्दन, पूजन और ध्यान किया करते हैं॥ ४२॥

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