श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 12.9.17

द्वादश स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

क्वचिद् गतो महावर्ते तरलैस्ताडितः क्‍वचित्।

यादोभिर्भक्ष्यते क्वापि स्वयमन्योन्यघातिभिः॥ १७

kvacid gato mahāvarte taralaistāḍitaḥ kvacit|

yādobhirbhakṣyate kvāpi svayamanyonyaghātibhiḥ|| 17

अर्थ

वे कभी बड़े भारी भँवरमें पड़ जाते, कभी तरल तरंगोंकी चोटसे चंचल हो उठते। जब कभी जल-जन्तु आपसमें एक-दूसरेपर आक्रमण करते, तब ये अचानक ही उनके शिकार बन जाते॥ १७॥

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