भगवान् नारायणने कहा—सम्मान्य ब्रह्मर्षि-शिरोमणि! तुम चित्तकी एकाग्रता, तपस्या, स्वाध्याय, संयम और मेरी अनन्य भक्तिसे सिद्ध हो गये हो॥ २॥✎ 1783
भो भो ब्रह्मर्षिवर्यासि सिद्ध आत्मसमाधिना।
मयि भक्त्यानपायिन्या तपःस्वाध्यायसंयमैः॥ २
भगवान् नारायणने कहा—सम्मान्य ब्रह्मर्षि-शिरोमणि! तुम चित्तकी एकाग्रता, तपस्या, स्वाध्याय, संयम और मेरी अनन्य भक्तिसे सिद्ध हो गये हो॥ २॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 12.9.2 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 953) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/9/2/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)