बुद्धिकी सहायतासे मनके द्वारा इन्द्रियोंको उनके विषयोंसे हटा ले और कर्मकी वासनाओंसे चंचल हुए मनको विचारके द्वारा रोककर भगवान्के मंगलमय रूपमें लगाये॥ १८॥✎ 116
नियच्छेद्विषयेभ्योऽक्षान्मनसा बुद्धिसारथिः।
मनः कर्मभिराक्षिप्तं शुभार्थे धारयेद्धिया॥ १८
बुद्धिकी सहायतासे मनके द्वारा इन्द्रियोंको उनके विषयोंसे हटा ले और कर्मकी वासनाओंसे चंचल हुए मनको विचारके द्वारा रोककर भगवान्के मंगलमय रूपमें लगाये॥ १८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 2.1.18 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 183) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/2/1/18/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#116 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् में → भगवान्में