श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.1.18

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

नियच्छेद्विषयेभ्योऽक्षान्मनसा बुद्धिसारथिः।

मनः कर्मभिराक्षिप्तं शुभार्थे धारयेद्धिया॥ १८

niyacchedviṣayebhyo'kṣānmanasā buddhisārathiḥ|

manaḥ karmabhirākṣiptaṃ śubhārthe dhārayeddhiyā|| 18

अर्थ

बुद्धिकी सहायतासे मनके द्वारा इन्द्रियोंको उनके विषयोंसे हटा ले और कर्मकी वासनाओंसे चंचल हुए मनको विचारके द्वारा रोककर भगवान्‌के मंगलमय रूपमें लगाये॥ १८॥✎ 116

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #116 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् में → भगवान्‌में

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