श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.1.26

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

पातालमेतस्य हि पादमूलं पठन्ति पार्ष्णिप्रपदे रसातलम्।

महातलं विश्‍वसृजोऽथ गुल्फौ तलातलं वै पुरुषस्य जङ्घे॥ २६

pātālametasya hi pādamūlaṃ paṭhanti pārṣṇiprapade rasātalam|

mahātalaṃ viśvasṛjo'tha gulphau talātalaṃ vai puruṣasya jaṅghe|| 26

अर्थ

तत्त्वज्ञ पुरुष उनका इस प्रकार वर्णन करते हैं—पाताल विराट् पुरुषके तलवे हैं, उनकी एड़ियाँ और पंजे रसातल हैं, दोनों गुल्फ—एड़ीके ऊपरकी गाँठें महातल हैं, उनके पैरके पिंडे तलातल हैं,॥ २६॥

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