श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.1.29

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

इन्द्रादयो बाहव आहुरुस्राः कर्णौ दिशः श्रोत्रममुष्य शब्दः।

नासत्यदस्रौ परमस्य नासे घ्राणोऽस्य गन्धो मुखमग्‍निरिद्धः॥ २९

indrādayo bāhava āhurusrāḥ karṇau diśaḥ śrotramamuṣya śabdaḥ|

nāsatyadasrau paramasya nāse ghrāṇo'sya gandho mukhamagniriddhaḥ|| 29

अर्थ

इन्द्रादि देवता उनकी भुजाएँ हैं। दिशाएँ कान और शब्द श्रवणेन्द्रिय हैं। दोनों अश्विनीकुमार उनकी नासिकाके छिद्र हैं; गन्ध घ्राणेन्द्रिय है और धधकती हुई आग उनका मुख है॥ २९॥

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