श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.1.31

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

छन्दांस्यनन्तस्य शिरो गृणन्ति दंष्ट्रा यमः स्नेहकला द्विजानि।

हासो जनोन्मादकरी च माया दुरन्तसर्गो यदपाङ्गमोक्षः॥ ३१

chandāṃsyanantasya śiro gṛṇanti daṃṣṭrā yamaḥ snehakalā dvijāni|

hāso janonmādakarī ca māyā durantasargo yadapāṅgamokṣaḥ|| 31

अर्थ

वेदोंको भगवान्‌का ब्रह्मरन्ध्र कहते हैं और यमको दाढ़ें। सब प्रकारके स्नेह दाँत हैं और उनकी जगन्मोहिनी मायाको ही उनकी मुसकान कहते हैं। यह अनन्त सृष्टि उसी मायाका कटाक्ष-विक्षेप है॥ ३१॥

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