श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.10.4

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 10 · अथ दशमोऽध्यायः

स्थितिर्वैकुण्ठविजयः पोषणं तदनुग्रहः।

मन्वन्तराणि सद्धर्म ऊतयः कर्मवासनाः॥ ४

sthitirvaikuṇṭhavijayaḥ poṣaṇaṃ tadanugrahaḥ|

manvantarāṇi saddharma ūtayaḥ karmavāsanāḥ|| 4

अर्थ

प्रतिपद नाशकी ओर बढ़नेवाली सृष्टिको एक मर्यादामें स्थिर रखनेसे भगवान् विष्णुकी जो श्रेष्ठता सिद्ध होती है, उसका नाम ‘स्थान’ है। अपने द्वारा सुरक्षित सृष्टिमें भक्तोंके ऊपर उनकी जो कृपा होती है, उसका नाम है ‘पोषण’। मन्वन्तरोंके अधिपति जो भगवद्भक्ति और प्रजापालनरूप शुद्ध धर्मका अनुष्ठान करते हैं, उसे ‘मन्वन्तर’ कहते हैं। जीवोंकी वे वासनाएँ, जो कर्मके द्वारा उन्हें बन्धनमें डाल देती हैं, ‘ऊति’ नामसे कही जाती हैं॥ ४॥

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