॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 2.10.40
द्विविधाश्चतुर्विधा येऽन्ये जलस्थलनभौकसः।
कुशलाकुशला२ मिश्राः कर्मणां गतयस्त्विमाः॥ ४०
dvividhāścaturvidhā ye'nye jalasthalanabhaukasaḥ|
kuśalākuśalā miśrāḥ karmaṇāṃ gatayastvimāḥ|| 40
अर्थ
संसारमें चर और अचर भेदसे दो प्रकारके तथा जरायुज, अण्डज, स्वेदज और उद्भिज्ज भेदसे चार प्रकारके जितने भी जलचर, थलचर तथा आकाशचारी प्राणी हैं, सब-के-सब शुभ-अशुभ और मिश्रित कर्मोंके तदनुरूप फल हैं ॥ ४०॥
टिप्पणियाँ
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प्रा० पा०—कुशलाकुशलमिश्राणां।