॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 2.10.9
एकमेकतराभावे यदा नोपलभामहे।
त्रितयं तत्र यो वेद स आत्मा स्वाश्रयाश्रयः॥ ९
ekamekatarābhāve yadā nopalabhāmahe|
tritayaṃ tatra yo veda sa ātmā svāśrayāśrayaḥ|| 9
अर्थ
इन तीनोंमें यदि एकका भी अभाव हो जाय तो दूसरे दोकी उपलब्धि नहीं हो सकती। अतः जो इन तीनोंको जानता है, वह परमात्मा ही सबका अधिष्ठान ‘आश्रय’ तत्त्व है। उसका आश्रय वह स्वयं ही है, दूसरा कोई नहीं॥ ९॥